समर्थ एवं समृद्ध भारत हेतु मूल्य आधारित शासन एवं प्रशासन की अवधारणा
समर्थ एवं समृद्ध भारत हेतु मूल्य आधारित शासन एवं प्रशासन की अवधारणा
भारत विभिन्नताओं वाला राष्ट्र है। यहाँ विभिन्न जाति, वर्ग, धर्मों, आस्थाओं और आर्थिक विषमताओं से जुड़े लोग रहते हैं। यहाँ प्रान्त भी भाषाओं के आधार पर विभाजित हैं। यहाँ ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ पर असमानता न हो। इतना सब कुछ होते हुए भी लोग राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव रखते हैं और वासुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को मानते हुए विश्वकल्याण की भावना रखते हैं। यही भारतीय संस्कृति और परम्परा है। इतने समृद्ध विश्वानुकर्णीय परम्परा वाले देश में भी नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। इसलिए मूल्य परक जीवन शैली अपनाने के स्थान पर हम इन मूल्यों की चर्चा मात्र कर रहे हैं ।
हमारे प्रशासनिक अधिकारी जन प्रतिनिधियों को अपने मार्गदर्शन में प्रशासनिक कार्य सिखाते और करते हैं और अपने अनुरूप ढालने की कोशिश करते हैं। कई बार तो ये अधिकारी अपने हितों की पूर्ति के लिए जन हितों की तिलाँजलि देकर जनता की अनदेखी कर देते हैं। ये उनका भृष्ट आचरण है। इसी तरह भृष्ट जन प्रतिनिधि भी ईमानदार अधिकारियों को भृष्ट आचरण करने के लिए दुष्प्रेरित करते हैं अथवा ऐसा करने के लिए दबाव बनाते हैं। इस तरह एक ईमानदार अधिकारी भी भृष्टाचार के दलदल में डूब जाता है और देश का नुकसान करने लगता है।
किसी भी व्यक्ति का ईमानदार होना या न होना उसकी मानसिक दशा का परिणाम है। किसी की मानसिकता पर अन्कुश लगाना सबसे कठिन कार्य है। यह किसी नियम अथवा कानून से लादा नहीं जा सकता। मेरा विचार है कि लोगों से ईमानदार आचरण की अपेक्षा ही न की जाये बल्कि माहौल ही इस तरह का बना दिया जाये कि लोगों को ईमानदार रहना ही पड़े। ठीक उसी तरह जिस तरह पानी बरसने पर स्वयं बचना आवश्यक हो जाता है वरना भीगना निश्चित है। ऐसा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान देना ही होगा । आईये हम कुछ उपायों पर विचार करते हैं।
सबसे पहले सरकारी एवं जनता से जुड़े कार्यों को करने और होने में पारदर्शिता होनी चाहिये। पारदर्शिता का तात्पर्य यह नहीं कि किसी कार्य को पूर्ण करने की प्रक्रिया की जानकारी मात्र देना बल्कि प्रक्रिया को मितव्ययिता से पूर्ण कराना भी है। पारदर्शिता का मतलब यह होना चाहिये कि प्रत्येक वह कार्य जो क्रियान्वन के लिये बहुत आवश्यक न हो नहीं किया जाना चाहिये। प्राप्त आँकड़ों की सत्यता की निष्पक्ष जाँच की जाना चाहिये। पारदर्शिता से भृष्ट आचरण पर कुछ हद तक लगाम लगाई जा सकती है। इस पारदर्शिता को कानून के द्वारा प्रभावशाली बनाकर सम्बंधित की जबाबदेही तय की जा सकती है। इसमें शासक और प्रशासक वर्ग की इच्छा शक्ति बहुत महत्व रखती और इसी इच्छाशक्ति के अभाव में अभी तक जनहितैषी कार्य प्रभावी ढँग से सम्पन्न होते नहीं दिख रहे हैं।
अब हम चुनाव प्रक्रिया से प्रभावित होने वाले राजनैतिक भृष्टाचार की समीक्षा करते हैं। शुचिता पूर्ण राजनीति के लिये चुनाव प्रक्रिया में सुधार लाना आवश्यक हो गया है। चुनाव प्रक्रिया में धन का दुरुपयोग भृष्ट आचरण का कारण बनता है। जब कोई व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँच जाता है तो एक ऐसे वर्ग का बन जाता है जिसकी कोई जाति, धर्म अथवा समुदाय विशेष नहीं होता उनका सिर्फ और सिर्फ धन ही सब कुछ हो जाता है। और जो इनका विरोध करता है उसे नेश्तनाबूद कर दिया जाता है। देश भक्ति और ईमानदारी की बात करने वाला इन भृष्ठ वर्ग में महामूर्ख कहलाता है।
अब प्रश्न यह है कि ऐसी स्तरहीन सोच विकसित होने के पीछे वे ऐसे कौन से कारक हैं जो लोगों का ज़मीर नष्ट करके स्वार्थी और मौकापरस्त बना देते हैं। इन कारकों में प्रमुख कारक है राजनीति का व्यवसायीकरण। आजकल राजनीतिज्ञ मुख्यतया समाजसेवा के लिए नहीं बल्कि व्यवसाय के लिए व्यवसायी की तरह पूँजी लगाकर एक के चार करने आता है। अब चूँकि हमारे देश में कोई भी गरीब आदमी चुनाव लड़ ही नहीं सकता क्योंकि चुनाव प्रक्रिया के पहले चरण में ही उसे जमानत राशि और कागजी खाना पूर्ति के लिए धन खर्च करना पड़ता है। अब यह खर्च कर भी लिया जाए तो चुनाव प्रचार में भी खर्च करना ही पड़ेगा वरना जमानत भी नहीं बच पायेगी। हम देखते हैं कि चुनाव आयोग ने भी विभिन्न चुनावों में स्तर के अनुसार खर्च की सीमा रखी है। इससे भी पता चलता है कि चुनाव वगैर पैसे के लड़ा ही नहीं जा सकता है। जिस राजनीति की नींव ही जब धन पर ही रखी हो उन राजनीतिज्ञों से क्या अपेक्षायें की जा सकती हैं। मेरा अनुभव तो ये है कि कई प्रत्याशी तो अपनी जमीन जायदाद बेचकर अथवा गिरवी रखकर तक चुनाव लड़ते हैं। अब ये तो कोई करेगा नहीं कि समाज सेवा के नाम पर अपना सब कुछ दाँव पर लगा कर खुद सड़क पर आ जाए । उसे कुछ न कुछ तो कमाने की प्रत्याशा रहती ही होगी। अब जो चुनाव अपनी परिसम्पत्तियों को दाँव पर लगाकर लड़े गये हों वो सदाचरण करे ऐसा तो सोचना भी असंगत है। अतः भारतीय जन मानस को अब ऐसी चुनाव प्रणाली अपनानी चाहिये जहाँ सिर्फ समाजसेवी ही वगैर किसी लालच के चुनाव लड़ सकें अथवा प्रक्रिया सम्मत चुने जा सकें। जब किसी व्यक्ति को अपना खर्च नहीं करना पड़ेगा तो वह ईमानदारी से समाजसेवा करेगा। वरना पहले वह अपनी लागत सूद समेत वसूल करेगा फिर यदि तब तक समाज व देश बचा रहेगा तो समाजसेवा भी कर लेगा।
जब से शिक्षा का निजीकरण हुआ है तब से फीस में अँधाधुंध वृद्धि हुई है जिससे अब उच्च शिक्षा गरीबों के लिए दिवास्वप्न बनकर रह गई है और गुणवत्ता पूर्ण मूल्य परक शिक्षा का अभाव हो गया है। विद्यार्थी फीस के दबाव के चलते अपनी योग्यता के अनुसार शिक्षा गृहण करने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। कर्ज के द्वारा गरीब शिक्षा तक तो पहुँच पा रहा है परन्तु इतना खर्च करने के बाद उस कर्ज को पटाने के लिए यदि अवैध विकल्पों का उपयोग कर रहा हो तो कोई आश्चर्य नहीं है। यहाँ देखने वाली बात यह भी है कि विद्यार्थी के साथ उसका अभिभावक परिवार भी होता है जिन्होंने अपना पेट काट-काट कर अपने आश्रितों की फीस आदि खर्चों का इंतजाम करने में ही सारी जिन्दगी की जमा पूँजी लगा दी है। यदि राष्ट्र को ईमानदार कर्त्तव्यनिष्ठ लोकसेवक चाहिए तो अपनी शिक्षा नीति की समीक्षा करनी चाहिए ताकि देश को मूल्य परक जबाबदेह पढ़े लिखे उच्च शिक्षित नागरिक उपलब्ध हों। जब देश उनसे जन्म से ही शुल्क लेना शुरू कर देता है तो देश को भी उनसे ईमानदारी सदाचरण की अपेक्षायें नहीं रखनी चाहिये कि वे अपना सौ प्रतिशत देश को दें। उनके ऊपर उनके अभिभावक और आश्रितों का भार है। अब उसे मौका मिला है तो पूरी कीमत वसूल रहा है तो इसमें गलत क्या है? तात्पर्य यह कि सरकार को इन बिन्दुओं पर गौर करते हुए जन एवं राष्ट्र हितैषी शिक्षा नीति बनानी चाहिए ताकि उसे अनुगृहीत नागरिक प्राप्त हों न कि कुण्ठाओं से ग्रसित अराजक लोग।
सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली विभिन्न योजनाओं का लाभ हितग्राहियों को विभिन्न संस्थानों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है। किन्तु भृष्ट आचरण ( आर्थिक, कर्त्तव्यहीनता, आलस्य आदि )के कारण हितग्राहियों तक या तो पहुँचता ही नहीं अथवा कम मात्रा में उपलब्ध करा कर खाना पूर्ति कर ली जाती है। इसकी शिकायत इत्यादि करने पर सम्बंधित अधिकारी अपने और अपने सहयोगियों के हितों के कारण कार्यवाही ही नहीं करते अथवा कार्यवाही का दिखावा करते हैं। बल्कि कई बार तो पीड़ित ही इनके आक्रोश का शिकार हो जाता है। अपने हितों के कारण न तो नेता और न ही समाज सेवक आगे बढ़कर गरीब, मजबूर, लाचार हितग्राही की फरियाद सुनते हैं और न ही शासन पर दबाव बनाते हैं। इन्हीं विषमताओं को देखते हुए मेरा सुझाव है कि प्रत्येक व्यक्ति को समर्थ बना दिया जाए ताकि हितग्राही स्वयं ही अपने ऊपर होने वाले अन्याय से लड़ सके और अपना और अपने देश के कल्याण करने की स्थिति में आ जाये।
मेरा सुझाव है कि आसपास के दस-दस परिवारों को संगठित करके पंचायत जैसा एक समूह बना दिया जाये और इन परिवारों के प्रत्येक सदस्य को इनका पंच बना दिया जाये। इसमें रंग, जाति, धर्म, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि का कोई भेद नहीं किया जाये। सबको समान अधिकार दिये जाएँ । सारे पंच मिल जुल कर अपने पंचायत क्षेत्र ( जहाँ उन सदस्य परिवारों के घर बने हुए हैं ) की सुख सुविधाओं भूख, प्यास, बीमारी, आवागमन, शिक्षा, सुरक्षा और नैतिकता आदि को सुनिश्चित कर सकें । इसी तरह दस-दस परिवारों की पंचायतों से ग्राम अथवा शहर को बाँट दें। इन्हीं परिवारों के बुजुर्ग एवं पढे लिखे पंचों के द्वारा उनके पंचायत क्षेत्र की न्यायिक एवं प्रशासनिक स्थानीय समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करें। क्योंकि स्थानीय सम्स्याओं को स्थानीय ही समझ सकता है। जरूरत पड़ने पर ही सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी से सहायता लें। अपने क्षेत्र में होने वाली प्रत्येक गतिविधि पर जिम्मेदारी पूर्वक नजर रखें। चूँकि ऐसी प्रत्येक गतिविधि से उनका अपना हित जुड़ा हुआ होगा। यदि कोई सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थान द्वारा कोई ऐसी गतिविधि जिसे पंचायत अनैतिक अथवा गलत समझती है की शिकायत उक्त विभाग के सक्षम अधिकारी से करके उचित समाधान करायेगा। अवैध गतिविधियों में लगे किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जायेगा तत्काल कार्यवाही करायी जायेगी। संगठन हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, हिंसा आदि से दूर रहेगा ।
इन दस-दस परिवारों के समूहों (पंचायतों) का कार्यक्षेत्र उनका निवास क्षेत्र ही होगा। आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न संलग्न पंचायतों के सहयोग से ग्राम, नगर, तहसील, ब्लॉक, जिला, सम्भाग, प्रान्त अथवा राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार किया जा सकेगा। प्रत्येक व्यक्ति (पंच) की सम्मान पूर्वक सामान्य जीवन शैली को बिना किसी भेदभाव के सुनिश्चित करना ही संगठन का उद्देश्य होगा। संगठन को लचीला रखा जायेगा । संगठन की मजबूती के लिए सकारात्मक सुझावों से परिवर्तन किये जा सकेंगे। इस तरह के संगठन के द्वारा सरकार की जन योजनाओं को लागू करने में लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की जाए ताकि योजनाओं की गुणवत्ता बनी रहे और उनका लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुँचना सुनिश्चित किया जा सके। इस तरह कोई भी जनता को नहीं लूट पायेगा और भृष्टाचार करने से भी डरेगा।
इस तरह ये सही मायनों में प्रजातन्त्र की ओर बढ़ता एक कदम होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीवन शैली में देशभक्ति भी जोड़ लेगा और अपने ऊपर होने वाले प्रत्येक अन्याय का सामना भी कर पायेगा। इस तरह से संगठित जन समूह भारत की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगायेगा साथ ही वासुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को चरित्रार्थ करेगा। एक बार फिर भारत विश्व गुरू होने का दर्जा प्राप्त करेगा।
इस तरह हम समर्थ और समृद्ध भारत को मूल्य आधारित शासन प्रशासन प्रणाली दे सकते हैं। जहाँ प्रत्येक नागरिक अपनी सम्पूर्ण निष्ठा देश को समर्पित करेगा।
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